विश्व युद्ध के बाद इटली में फासीवाद की विचारधारा का उदय हुआ,  इस विचारधारा की स्थापना मुसोलिन ने की थी।

प्रथम विश्व युद्ध के बाद पेरिस की संधि में मित्र राष्ट्रों ने  इटली के साथ अलगाववाद की नीति अपनाई, इससे पहले मित्र राष्ट्रों ने इटली को अपनी ओर मिलाने के लिए बहुत सारे वादे किए थे लेकिन पेरिस की संधि में मित्र राष्ट्र ने इटली के साथ अलगाव का व्यवहार किया।


फासीवादी दल के उदय के कारण

असंतोष और निराशा स्थिति में फासीवाद का जन्म हुआ इसके लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायित्व थे।


  • वर्साय की संधि से निराशा

शांति सम्मेलन में इटली ने स्वयं को असंतुष्ट राज्यों की श्रेणी में पाया। अपनी त्रिगुट संधि के बावजूद भी इटली प्रथम युद्ध में मित्र राष्ट्र की ओर इसलिए शामिल हुआ था कि 1915 में लंदन में गुप्त समिति में मित्र राष्ट्र ने  इटली को लालच दिया था कि जीतने के बाद उसे  डा लमेशिया का एक बड़ा भाग दिला देंगे, पेरिस की संधि पर लंदन की संधि कूटनीतिक शव में परिवर्तित हो गई। 1919 के अंतिम समझौते में उसके अंतरराष्ट्रीय सम्मान को गहरा धक्का लगा, वर्साय की संधि ने उसकी आशाओं पर पानी फेर दिया। इटली को केवल 16 लाख 72 हजार जनसंख्या वाली 8  हजार 900 वर्ग मील भूमि ही प्राप्त हुई। इसके लिए  इटली की जनता ने अपने सरकार को बताया इस तरह संसदीय शासन के स्थान पर शासन का मार्ग अपने आप  परास्त हो गया था।


  • जनता का असंतोष

पेरिस की शांति सम्मेलन से इटली की जनता को अपनी आकांक्षाओं के अनुसार लाभ प्राप्त नहीं हुआ, जनता में बहुत असंतोष था, 1919 में डेंजों नामक एक इटालियन  कवि ने बलपूर्वक नगर पर अधिकार कर लिया तथा वह नगर का स्वतंत्र शासक बन गया इटली की सरकार ने  डेनजीओ को दबाने के लिए कोई साहस नहीं किया, डेंजियो की वीरता से इटली के निवासी  बहुत प्रभावित हुए। इस परिस्थिति का लाभ उठाकर फासिस्ट दल ने यह घोषणा कर दी कि यह सरकार की अयोग्यता के कारण ही हम को उस नगर को छोड़ना पड़ा इससे युद्ध में भाग लेने वाले सैनिक भी फासिस्ट दल की ओर हो गए, इससे फासीवादी दल की शक्ति बहुत बढ़ गई तंत्र सरकार बदनाम हो गई। जनता तथा देशभक्त नेता जनतंत्र वादी नेताओं को घृणा से  परोपजिवी कहने लगे।


  • आर्थिक कठिनाइयों तथा असंतोष

महा युद्ध के कारण  इटली को बहुत अधिक नुकसान हुआ था। उद्योग धंधे और वाणिज्य व्यापार रचित हो गई थी बेरोजगारी बढ़ गई थी कृषि की प्रगति रुक गई थी, सरकार कर्ज बोझ में दबी हुई थी। इटली की मुद्रा का मूल्य 70% काम हो गया। वस्तु का मूल्य का  आसमान छूने लगा। जनसाधारण का जीवन निर्वाह करना कठिन हो गया। इस आर्थिक पतन की अवस्था ने  इटली को पहले से  कमजोर  राजनैतिक व्यवस्था को अंतिम धक्का दिया।  असंतुष्ट जनता का  प्रजातंत्र की शासन व्यवस्था से विश्वास हट गया। जगह-जगह  विद्रोह होने लगे, हड़ताल होने लगी।  इटली ने इन कठिनाइयों को इसलिए मोल  लिया था क्योंकि उसे लग रहा था कि विजय होने के बाद उसे बहुत ज्यादा लाभ मिलेगा पर उसे कुछ भी नहीं प्राप्त हुआ। इटली के  राष्ट्रीय उत्साह को  गहरा धक्का लगा था।

मुसोलिनी ने इटली की जनता में एक  नई भावना जागृत की।


  • राष्ट्रीयता पर आघात

19वीं सदी में  यूरोपीय देश आर्थिक हितों की पूर्ति तथा गौरव में वृद्धि करने के लिए साम्राज्य का विस्तार कर रहे थे। इटली ने भी ट्यूनीशिया पर अधिकार करना चाहता था, किंतु 1881 में जर्मनी के प्रोत्साहन पर ने उस पर अधिकार कर लिया। तत्पश्चात इटली ने अबीसीनिया पर  आक्रमण कर दिया किंतु अजेबा के युद्ध में  इटली को अपमानजनक हार का सामना करना पड़ा, इस पराजय से इटली के  जनतंत्र सरकार के स्थान पर एक ऐसी शक्तिशाली सरकार की स्थापना चाहते थे जो इटली वासियों की राष्ट्रीयआक्षाओं की पूर्ति कर सके तथा अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में इटली की प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित कर सके। फासीवादी दल ने इटली वासियों की इस अकाउंट की पूर्ति करने की घोषणा कर दी और फासीवाद दल को जनता का समर्थन भी मिल गया।


  • साम्यवाद का जोर

असंतोष और निराशा के इस वातावरण में इटली में साम्यवाद जोर पकड़ने लगा था, हड़ताले तथा तोड़फोड़ आरंभ हो गई, रूस की साम्यवादी क्रांति द्वारा किसान मजदूर शासन स्थापित करने की  तैयारी करने लगे। इटालियन मार्क्सवाद अथवा राष्ट्रीयता को महत्व देता था, अंतर्राष्ट्रीय तक हो उसके लिए कोई महत्व नहीं था।  उग्र राष्ट्रवादी की भावना के भाव से  फासीवाद की विकास को बहुत  प्रोत्साहन मिला।


  • वाममार्गी  दलों का उदय

इटली में वाममार्गी  दलों के उदय में फासीवाद के मार्ग को साफ कर दिया। इटली में अनेक राजनीतिक गए थे  अनुपातिक निर्वाचन प्रणाली के कारण  प्रायः  दल के राजनेता  लोकसभा पहुंच जाते थे। परंतु किसी भी दल में इतना बहुमत नहीं था कि वह स्वतंत्र रूप से अपना मंत्रिमंडल बना सके। इससे संयुक्त मंत्रीमंडलों का निर्माण किया जाता था, सदस्य देश की समस्याएं के संबंध में  विचार ना करके  मंत्रिमंडल को जोड़कर सत्ता  अपने हाथों में ग्रहण करने का प्रयास किया जाता था। 1919 के निर्वाचन में बहुमत उदारवादियों का था और दूसरा दल सोशल डेमोक्रेट्स था। परंतु यह पारस्परिक विरोध के कारण आपस में मिलकर उग्रवादियों का विरोध ना कर सके,इसका लाभ फासीवादी दल ने उठाया।


  • भविष्यवाणी आंदोलन

इस आंदोलन का नेता मेरीनेटी था।  वह भूतकाल की समस्त मान्यताओं का विरोधी था, युद्ध को एक आवश्यक कार्य मानता था और कहता था कि विश्व की सफाई के लिए युद्ध अनिवार्य है। इसने प्रजातंत्र उदारता और शांति वक्त का विरोध किया उसके विचारों से  फासीवादी दल को बहुत प्रोत्साहन मिला।


  • डार्विनवाद परंपरागत और हिगलवाद का प्रचार

डार्विन के अनुसार जो जीवन के संघर्ष  प्रतिस्पर्धा में नहीं ठहर सकता है नष्ट हो जाते हैं, परंपरा वाद के सहारे  फासीवाद ने राष्ट्रवाद का निर्माण किया। हिग्लवाद के  प्रचार ने इटली फासीवाद को बहुत प्रोत्साहन दिया।


  • सभी वर्गों से सशक्त शासन की मांग

इटली की भूमि पति शक्तिशाली शासन चाहते थे जिससे कि निजी संपत्ति की सुरक्षा हो सके। विश्वविद्यालय के प्राध्यापक तथा तिवारी तत्कालीन पूर्ण व्यवस्था से घबरा उठे, और देश में शांति और व्यवस्था की स्थापना चाहते थे और इसीलिए वह भी शक्तिशाली शासन के इच्छुक थे कि इटली अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में प्रभावपूर्ण स्थान प्राप्त कर सके। अतः इटली की पूंजी पत्ती तथा उद्योगपति शक्तिशाली शासन इसलिए चाहते थे कि मजदूरों पर नियंत्रण स्थापित हो सके और वाणिज्य व्यापार तथा उद्योग की उन्नति हो सके। किसान भी दूरव्यवस्था का अंत चाहते थे जिससे वे शांतिपूर्ण खेतों में काम कर सकेंगे। हटा शक्तिशाली शासन की मांग इसलिए के चारों ओर से हो रही थी। ऐसी परिस्थितियों में इटली के राजनैतिक  माहौल का फायदा  फासीवादी दल ने उठाया।


  • सरकार की निष्क्रियता और आक्रमणकारी नीति

एक तरफ इटली में इस तरह अराजकता फैली हुई थी दूसरी तरफ सरकार हाथ पर हाथ रखे चुपचाप बैठी थी। उसके द्वारा अराजकता और असंतोष की स्थिति समाप्त करने का कोई प्रयास नहीं किया जिसके परिणाम समिति की दशा बिगड़ती गई।

इन परिस्थितियों में देश में एक  ऐसे दल का जन्म हुआ जिसने एसटी के शासन का स्वरूप बदल दिया और यह दल फासीवादी दल कहलाया व्हाट इस दल के सदस्य फेसियो कहलाए। आरंभ में हो संगठन  अधिक प्रभावशाली नहीं था किंतु धीरे-धीरे इस आंदोलन का रूप बदलता। इस दल को  मुसोलीन के रूप में एक युग नेता मिला। इस प्रकार फासीवादी दल का विकास हुआ


मुसोलिनी की विदेश नीति

सुविधा की दृष्टि से मुसोलिनी की विदेश नीति का विवेचन निम्नलिखित  शीर्षक पर किया जा सकता है


  • फासीवाद विदेश नीति का मूल तत्व

मुसोलिनी कहां करता था कि  फासिज्म वह दर्शन है जो राज्य की सत्ता की सर्वोच्चता में विश्वास करता है और शक्ति अनुशासन तथा एकता पर बल देता है। इसलिए यह स्वाभाविक कि मूसलीम के नेतृत्व में फासीवाद इटली ने विदेश नीति  अपनाई, प्रारंभ में मुसोलिनी ने यह घोषणा की थी कि वह विदेशी मामलों में फासीवाद का प्रयोग नहीं करेगा अथवा दूसरे शब्दों मे  फासीवाद को वह  विदेश राजनैतिक से  पृथक करना चाहता था। परंतु उसने अपनी इस विचार को शीघ्र ही बदल दिया और अपनी सभी कूटनीतिक चालू में फासीवाद को  प्रविष्ट करा दिया।

मुसोलिनी की विदेश नीति  का सर्वोपरि उद्देश्य था राष्ट्रीय प्रतिष्ठा और गौरव की पुनः प्राप्ति। वह चाहता था कि अंतरराष्ट्रीय जगत में इटली एक सम्मानित स्थान प्राप्त करें, भूमध्य सागर में वह अपनी पूर्ण प्रभुसत्ता स्थापित करके अफ्रीका में विशाल औपनिवेशिक साम्राज्य का निर्माण करना चाहता था तथा वर्साय संधि का संशोधन करें। इन उद्देश्यों की पूर्ति तभी हो सकती थी जब सबसे पहले  इटली सैन्य शक्ति को शक्तिशाली बनाएं। पता मुसोलिनी ने सैनिक शक्ति के विकास को अपने कार्यक्रम का प्रथम अंग बनाया।  उपनिवेश की विजय और साम्राज्य विस्तार उसके कार्यक्रम का दूसरा प्रमुख अंग था, उसका विश्वास था कि वे आंखों में इटली की प्रतिष्ठा तब भी बढ़ सकती है जब इटली यहां सिद्ध कर दे कि उसने अपनी रक्षा करने की ही नहीं वरन दूसरों पर विजय प्राप्त करने की भी क्षमता है। सैनिक प्रतिष्ठा और समराज्य विस्तार द्वारा ही इटली को  उसका विगत गौरव पुनः प्राप्त हो सकता है।


मुसोलिनी का एक प्रमुख उद्देश्य भूमध्य सागर में प्रभु सत्ता स्थापित करना  तथा रोमन झील में परिवर्तन करना भी था। इटली को इस प्रभुत्व की आकांक्षा इसलिए थी कि उसके वाणिज्य का 80% भूमध्य सागर पर होता था और भूमध्य सागर के किनारे बसे हुए किसी भी देश की अपेक्षा उसका तटवर्ती प्रदेश अधिक था। वर्साय की संधि और  राष्ट्र संघ के अंग दोनों ही उसके मार्ग की रुकावटें थी उसका एक अन्य उद्देश्य इन्हें ठिकाने लगाना था।  इटली ने इसलिए इनका पहला उपहास किया, फिर उन्हें चुनौती दी और  गंदे तरीके से उन्हें ठोकर मार दी। भूमध्य सागर का मामला इटली के लिए कितना महत्वपूर्ण था और इस संबंध में स्त्री की क्या नीति थी जिससे स्पष्ट करते हुए कैटरीन दफ ने लिखा है कुछ ऐसी थी की भूमध्य सागर उसका साम्राज्य होने के बजाय उसके लिए एक जेल के समान था, माल्टा ट्यूनीशिया तथा साइप्रस उस जेल को  सीखते थे जबकि  जीरबर्ट्र ओर  स्वेज नहर इसके दरवाजों की रक्षा करती थी।  इटली संभवत लीबिया को सूडान , इथोपिया को जोड़कर हिंदी महासागर की ओर स्वानसी थी उत्तर अफ्रीका के रास्ते अटलांटिक की ओर आगे बढ़ता गया।

फासीवाद  मुसोलिनी की विदेश नीति की सफलता का मार्ग  तभी प्राप्त हो सकता था जब वह विरोधियों से शाम दंड भेद किसी भी उपाय से निपट सकती है। मुसोलिनी ने देखा चीन और सांचौर की भीषण  गंदी है उसने उसके संबंध में एक दूसरे के विरुद्ध करने दोनों कोई जर्मनी के खिलाफ उकसाने और  रोज के विरुद्ध कर देने की  चाल  खेली।  पश्चिम को शिथिल बना देने के लिए वह विरोधी समझौते जर्मनी के साथ शामिल हो गया फ्रांस और ब्रिटेन दोनों को चला कि सीमा देने के लिए उसने साम्यवाद से रक्षा करने के बहाने वहां हस्तक्षेप किया  और स्वयं को सैनिक का कूटनीतिक रूप से सुदूर स्थिति में किया।  जर्मनी की तरह 1940 में इटली ने फ्रांस पर हमला किया ताकि  धुरी राष्ट्र में जर्मनी जापान विजय होने के बाद ज्यादा लाभ प्राप्त करें।



मुसोलिनी  की विदेश नीति अथवा अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में कार्य

मुसोलिनी ने अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में इटली की स्थिति को  अच्छा किया। अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में इटली की दुर्लभता के दूर होने से उसका सम्मान बड़ा। मुसोलिनी ने इटली को सैनिक और आर्थिक दृष्टि से इतना मजबूत बना दिया और विदेश नीति के क्षेत्र में इतना  स्वेच्छाचारी  किया था कि पश्चिम की लोकतंत्र शक्तियों को भय पैदा होने लग गया। अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में मुसोलिनी ने महत्वपूर्ण कार्य किए थे।


  • रोड्स ओर डोडिकानिज पर अधिकार

यह दोनों द्वीप पहले इटली के अधिकार में थे पर 1920 में सेवर की संधि द्वारा यह द्वीप यूनान को दे दिए गए। इटली के देश भक्तों को यह मंजूर नहीं हुआ लड़की के कमाल पाशा ने जब यूनान को हराकर सेवर की संधि रद्द कर दी तो अवसर से ही लाभ उठाकर  मुसोलिनी रोड्स ओर डोडिकानिज पर अधिकार कर लिया। लुसाने की संधि द्वारा इटली को यदि पुनः प्राप्त हो गए इटली ने इन द्वीपों पर किलेबंदी करके नौसैनिक अड्डे स्थापित कर दिया।


  • यूनान और अल्बानिया के संघर्ष में हस्तक्षेप

अंतरराष्ट्रीय स्तर में इटली को खोई हुई प्रतिष्ठा पुनः स्थापित करने का दूसरा मौका  मुसोलिनी को  अल्बानिया और यूनान  के बीच चल रहे सीमा विवाद  के सिलसिले में मिला।  अल्बानिया और यूनान के बीच सीमा निर्धारित करने के लिए  अंतरराष्ट्रीय  आयोग नियुक्त किया गया था इसमें कुछ इटेलियन सदस्य भी थे ।  यह आयोग 1923 में यूनान गया। वहां की कुछ विरोधियों ने यूनानी द्वारा  इटली सदस्यों की हत्या कर दी, मुसोलिनी ने यूनान के हर्जाने के तौर पर एक लंबी रकम मांगी  और साथ ही भवरसा करके यूनान में कर्फ्यू नामक एक टापू पर अधिकार कर लिया अंत नहीं नाम को हर्जाना देना पड़ा और क्षमा मांगनी पड़ी।


  • युगोस्लाविया से संधि और फ्युमा का विभाजन

उत्तर एड्रियाटिक सागर में स्थित प्यूमा बंदर पर इटली की नजर थी। यह  प्रश्न इटली और युगोस्लाविया के बीच की विवाद का कारण बन गया था।  1920 में मित्र राष्ट्र ने अपने दबाव से देशों में समझौता कर  प्यूमा को एक स्वतंत्र  बंदरगाह घोषित कर दिया यह हालत संतोषजनक हुआ। मुसोलिनी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद  युगोस्लाविया के समक्ष एक सुझाव रखा और दोनों देश के बीच 1924 में एक संधि की गई। इसके अनुसार प्यूमा का एक खास नगर इटली को मिल गया बाकी के क्षेत्र युगोस्लाविया को।


  • अल्बानिया पर अधिकार

प्यूमा के बाद अल्बानिया की  बारी आई जो एड्रियाटिक सागर से दूसरे तट पर स्थित था। अल्बानिया एक गरीब राज्य था, यहां  शांति और व्यवस्था कायम नहीं कर सकता था। अत: उसने मुसोलिनी से आर्थिक सहायता मांगी। ऋण देकर मुसोलिनी ने उसे अपने प्रभाव में ले लिया  इस प्रकार एड्रियाटिक सागर को पूरी तरह  इटली के अधिकार में आ गया।



अबिसिनिया पर  अधिकार

फ्रांस और इटली के संबंधों में सुधार अधिक समय तक कायम नहीं रहा इथोपिया पर इटली की आक्रमण के कारण उनके संबंधों में  करवाहट पैदा हो गई, क्योंकि रात सनकी परिषद ने जब इटली को उचित किया तो उसका फ्रांस में विरोध नहीं किया।

अबीसीनिया  1935 में मुसोलिनी ने आक्रमण कर दिया जिसके मुख्य कारण

1 इटली साम्राज्य निर्माण की दौड़ में देर से शामिल हुआ  1935 में अफ्रीका में  मिस्र लाइबेरिया और दक्षिण अफ्रीका को जोड़कर संपूर्ण  यूरोपीय शक्ति के अंतर्गत आता था इसमें एक मात्र एक ऐसा देश था जिस पर इटली  अधिकार करने की आशा कर सकता था अबिसिनिया।
2 इटली की बढ़ती हुई जनसंख्या को खिलाने और बताने के लिए  नई औपनिवेशिक देशों की आवश्यकता थी। 
अबिसिनिया की आबादी लगभग 60 लाख थी उसका क्षेत्रफल 3  लाख  50000 वर्ग मील था जिससे इटली की अतिरिक्त जनसंख्या की समस्या का समाधान हो सकता था।
अबिसिनिया उसे अपने  कारखानों में विकास के लिए प्रचुर मात्रा में खनिज पदार्थ इमारती लकड़ी और उन रुई आदि कच्चा माल मिल सकता था।
3 1896 में अबिसिनिया ने  इटली को  अडोबा के युद्ध में  बुरी तरह पराजित किया था और इस  पराजय का बदला लेना चाहता था  यह भी एक कारण था कि इटली ने अबिसिनिया  पर आक्रमण किया।
4 उस समय तक जर्मन में नाजीवाद अपनी चरम शिखर पर पहुंच गया था, और  मित्र राष्ट्र ना जी बात से भयभीत हो रही थी।  मुसोलिनी को  मित्र राष्ट्र अपने  पक्ष में करने के लिए आते थे। मुसोलिनी अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को अपने पक्ष में समझ कर उसका लाभ उठाना चाहता था और इसलिए उसने अबिसिनिया पर आक्रमण कर दिया ।
इस समय राष्ट्र  एमएमर्साय की संधि का उल्लंघन कर दिया था इसके अतिरिक्त जवान ने मंसूरिया पर आक्रमण कर दिया था और मुसोलिनी राष्ट्र संघ की असफलता को समझ गया था इसलिए उसने परिस्थितियों को अपने को समझकर 
अबिसिनिया पर आक्रमण कर दिया।
अबिसिनिया पर आक्रमण का एक महत्वपूर्ण कारण 1929 की इटली की आर्थिक मंदी हुई थी आर्थिक मंदी के फलस्वरूप यूपी की जनता का ध्यान इस कठिनाई पूर्ण समस्या से हटाने के लिए  मुसोलिनी ने अबिसिनिया  पर आक्रमण किया।