जिस प्रकार फ्रांस की राज्यक्रांति  विश्व के इतिहास की एक महानतम घटना थी उसी प्रकार 1917 की  रूसी क्रांति को बीसवीं शताब्दी के   इतिहास की सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटना माना जाता है।

रूस की क्रांति
रूस की क्रांति



1917 की रूसी क्रांति के महत्वपूर्ण कारण क्या थे

1905 में हुई रूसी क्रांति असफल साबित हुई लेकिन 1917 में  रूस में फिर से क्रांति हो गई  इस क्रांति के महत्वपूर्ण कारण थे।


व्यवसाई क्रांति का प्रभाव

व्यवसाई क्रांति के फलस्वरूप उसमें बड़े-बड़े कारखानों की स्थापना हुई। इस में काम करने वाले हजारों  श्रमिक गांव और कस्बे से थे और कारखाने के निकट आकर नगरों में निवास करने लगे थे। इन श्रमिकों ने अपना क्लब भी स्थापित कर लिया था। इन क्लबों में कार्ल मार्क्स के साम्यवादी सिद्धांतों का प्रचार प्रसार करने के लिए क्रांतिकारी नेता भी आने लगे। धीरे-धीरे श्रमिक  बहुत अपने भविष्य को सुंदर बनाने के उद्देश्य से  साम्यवादी दल में शामिल हो गए।

फिशर के अनुसार  इस साम्यवादी पहचान ने देश के श्रमिकों में जारसाही के प्रति घोर असंतोष एवं घृणा उत्पन्न कर दी इसके कारण लोग जार के शासन का अंत करने के लिए क्रांतिकारियों का सामान देने लगे।


1905 की क्रांति का प्रभाव

सन उन्नीस सौ पांच में रूस की देशभक्तों ने राष्ट्रीयता की भावना से प्रेरित होकर  अपनी स्वाधीनता के लिए जार शाही  के विरुद्ध क्रांति कर दी थी। यद्यपि अपने उद्देश्य में सफलता नहीं मिल सकी थी।  फिर भी रूसी जनता को अपनी राजनैतिक  अधिकारों का ज्ञान हो गया था और वह मताधिकार तथा लोकतंत्र की महत्व को भली प्रकार से समझने लगी थी वह जार साही को मिटाकर रूस में वास्तविक लोकतंत्र  की स्थापना करने की इच्छुक हो गई थी।


यूरोपीय लोकतंत्र का प्रभाव

प्रथम विश्व युद्ध के प्रारंभ होने पर  रूस इंग्लैंड तथा फ्रांस के साथ ही बनकर  त्रिगुट राष्ट्र   के विरुद्ध लड़ने लगे थे। इंग्लैंड तथा फ्रांस  बार-बार  यह घोषणा कर रहे थे कीवी राष्ट्रीयता स्वतंत्रता और लोकतंत्र की रक्षा के लिए जर्मनी ऑस्ट्रिया हंगरी तथा टर्की के विरुद्ध युद्ध लड़ रहे हैं। उन्होंने अपने सिद्धांतों का युद्ध के दौरान  व्यापक  प्रचार किया और इसी प्रकार का रूसी जनता पर गहरा प्रभाव पड़ा और उसकी जार की निरंकुश एवं अत्याचारी शासन से मुक्ति पाने के लिए  योजना बनाने लगे।


जार निकोलस 2 की अयोग्यता

रूस का जार निकोलस 2  बड़ा अंधविश्वासी और अयोग्य शासक था।  उसने रूसी जनता पर  कई सारे अत्याचार किए थे, और उसमें  घटनाओं की महत्व  और व्यक्ति के चरित्र को  समझने की शक्ति नहीं थी।

इस प्रकार जा निकोलस सेकंड की  अयोग्यता रूसी क्रांति का  प्रमुख कारण बनी ।


जार के रूसीकरण की नीति

रूस के  विशाल साम्राज्य में  बहुत सी जनजाति  निवास करती थी जो अपनी भाषा धर्म और संस्कृति की भिन्नता के कारण अपनी स्वतंत्रता सत्ता स्थापित करने के इच्छुक थे, परंतु जार उन्हें स्वतंत्रता देने के स्थान पर उनकी  सांस्कृतिक रूसीकरण करना चाहता था। इससे अल्पसंख्यक जातियों में भारी असंतोष उत्पन्न हो चुका था संतोष आगे चलकर क्रांति लाने में सहायक सिद्ध हुआ।


भ्रष्ट और अकुशल शासन

का शासन बड़ा भ्रष्ट और निकम्मा था जारशाही के  अधिकारी  अपने स्वार्थ के लिए  जनता पर अत्याचार करते थे  और बुरी तरह शोषण करते थे। रूसी जनता के जार के भ्रष्ट और कुशल शासन के विरुद्ध घोर असंतोष उत्पन्न हो गया था ।


ड्यूमा सांसद की दुर्लभता

1905 ईसवी की क्रांति के परिणाम स्वरूप  ड्यूमा सांसद की स्थापना हो चुकी थी, परंतु उसके हाथ में कोई शक्ति ना थी।  ड्यूमा केवल  जार  परामर्श देने का अधिकार रखती थी और ड्यूमा के सदस्य जार की चापलूसी करके हां में हां मिला या करते थे।

अतः ड्यूमा की  दुर्लभता भी क्रांति का एक महत्वपूर्ण कारण बनी।


सरकार की अयोग्यता और मूर्खतापूर्ण कार्य

रूस में  जार साही  के विरुद्ध क्रांति की पृष्ठभूमि तैयार हो चुकी थी सरकार की अयोग्यता एवं मूर्खतापूर्ण कार्य ने रूसी क्रांति का विस्फोट करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

सरकार की अयोग्यता के कारण  सितंबर 1914 में  टेनानबेग जनवरी 4 फरवरी चूड़ियां के युद्धों में रूसी सेनाओं को भीषण पर आधे उठानी पड़ी। लाखों रूसी सैनिक मारे गए और एक लाख दूसरी सैनिक शत्रु के हाथों बंदी बना लिए गए रूसी  सेना की पराजय का मुख्य कारण युद्ध सामग्री का भाव और सरकार का  भ्रष्ट प्रबंध था । इससे जार के शासन के विरुद्ध जनता में व्यापक असंतोष होने लगा।

फरवरी 1917 ईस्वी में मास्को में बुद्धिजीवी का एक जिसमें ड्यूमा अधिवेशन को तत्काल बुलाया गया। परंतु जार और उसके भ्रष्ट दरबारी अपने  विलासिता में  लुप्त हो रही थे।  उनका जनता की मांग की ओर कोई ध्यान नहीं था। 7  मार्च 1917 को  रूसी क्रांति का पहला विस्फोट हो गया था।


1917 की रूसी क्रांति के दो विभिन्न रूप थे। वास्तव में इन रूपों को क्रांति का पहला और दूसरा दौर कहना उपयुक्त होगा। क्रांति का प्रथम दौर 17 मार्च 1917  ईस्वी को प्रारंभ हुआ। जिसे हम राजनीति क्रांति की संज्ञा दे सकते हैं और क्रांति का दूसरा दौर  7 नवंबर 1917 ईस्वी को प्रारंभ हुआ, जिसे हम सामाजिक क्रांति का नाम दे सकते हैं क्रांति के प्रथम दौर के रूस में जार शाही का अंत हो गया और शासन सत्ता पर मध्यम वर्ग का अधिकार हो गया। दूसरे दौर में साम्यवादी ने लेनिन के नेतृत्व में मध्यमवर्ग की हाथ से सत्ता छीन कर  रूस में  श्रमिक वर्ग की तानाशाही स्थापित कर दी।


रूस की प्रथम क्रांति


7 मार्च 1917 की भीषण  दुर्घटना ने रूस में क्रांति का विस्फोट कर दिया। इस दिन भूखे प्यासे सर्दी से काफी आशा है मजदूरों ने पेट्रोग्राड की सड़कों पर  जुलूस निकाला। दोनों और दुकानों पर गरम-गरम  डबल रोटी ओके भंडार  हुए थे।  जिन्हें देख चुके व्याकुल श्रमिक उन डबल रोटी ऊपर टूट पड़े लूट कर वह अपना पेट शांत करने लगे। जाट साही के अधिकारियों और सैनिकों ने इन लोगों पर गोली चलाने का आदेश दिया हुसैनी पुणे भूखी और  निहत्थे श्रमिकों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया अपनी बंदूक और सेना की इस सहयोग ने क्रांतिकारियों के उत्साह को दोगुना कर दिया।


पेट्रोग्राड में क्रांति  8 मार्च 1917

इस दुर्घटना का समाचार पेट्रोग्राड में आग की तरह फैल गया और अगले दिन 8 मार्च को पेट्रोग्राड में  क्रांति की आग लग गई। क्रांतिकारी रोटी रोटी के नारे लगाते हुए पेट्रोग्राड  घूमने में लगे और दुकानों को लूटने लगे। नगर के कारखाने  मैं काम करने वाले लगभग 100000 मजदूरों ने हड़ताल कर दी और क्रांतिकारी के साथ मिलकर युद्ध बंद करो जारशाही के निरंकुश शासन का अंत हो जनता को राज्य आदि नारे लगाने लगे।  देश के समाजवादी साम्यवादी और अराजकतावादी तथा स्वार्थी तत्व इस अवसर का लाभ उठाकर जनता को और अधिक भड़काने लगे। 10 मार्च को संपूर्ण नगर में हड़ताल हो गई।


अंतरिम सरकार की स्थापना

जार से शासन सत्ता को मजदूरों ने छीना था पर उन्हें उसे तुरंत ही मध्यमवर्ग को सौंप दिया।

ब्यूटी और अस्थाई मजदूर तथा किसानों ने रूसी क्रांति को सफल बनाया था परंतु इस क्रांति की बात जो अंतरिम सरकार स्थापित गई उसका नेतृत्व कुलीन एवं मध्यम वर्ग के उदारवादी दल के नेता प्रिंस ने मंत्रिमंडल बनवाया। मित्र राष्ट्रों ने तत्काल ही रूस की इस अंतरिम सरकार को मान्यता दे दी।


रूस में दूसरी क्रांति


मेनशविक ओर बोल्शविको में  मतभेद

रूस के समाजवादी लोकतंत्र दल की दो शाखाएं थी। एक  शाखा नरमवादी थी, जिसे मैनशेविक कहा जाता था दूसरी शाखा उग्रवादी आमूल परिवर्तन वादियों की थी इसे बोल्शेविक कहा जाता था, बोल्शेविक़ को अपने  उग्र प्रचार से रूसी जनता का पूर्ण समर्थन प्राप्त कर लिया। उन्होंने अपने 3 नारे  युद्ध का अंत सबको भूमि और सबको रोटी निश्चित किया जाए। इन नारों से प्रभावित होकर उसी जनता  बोलशेविक के साथ पूर्ण सहयोग करने लगी।


लेनिन का  रूस आगमन

बोल्शेविक ओ का प्रमुख नेता लेनिन था। लेनिन  कार्ल मार्क्स का पक्का भक्त था और उसके समाजवादी सिद्धांत को व्यवहारिक रूप से रूस से परिवर्तित करना चाहता था। मार्च की क्रांति के समय वह स्विट्जरलैंड में निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहा था। क्रांति के समय बोल्शेविक उसने उसे स्वदेश लौटने का निमंत्रण भेजा था उस समय रूस और जर्मनी के मध्य युद्ध चल रहा था।

वास्तव में लेनिन के  व्यक्तित्व ने रूसी क्रांति में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।


जुलाई का असफल विद्रोह

युद्ध की पराजय से शुद्ध होकर बोल्शेविक उन्हें जनता और सेना के सहयोग से 1917 को केरेनरकी की सरकार  के विरुद्ध विद्रोह कर दिया लेकिन सरकार ने इस मित्रों को कठोरता पूर्वक नमन कर दिया और बोल्शेविक दल को  अवैध घोषित कर दिया। लेनिन  रूस से  भागकर फिनलैंड में शरण ले ली।


नवंबर की क्रांति

लेनिन के  नेतृत्व में बोल्शेविक ने अपना संगठन करना प्रारंभ कर दिया। बोल्शेविक ओके संगठन से भयभीत होकर न्यूज़ का दमन करने की योजना बनाई टीवी 6 नवंबर 1917 की रात्रि को 2:00 बजे  बोल्शेविक ने बिना रक्तपात की रेलवे स्टेशन , बैंक, टेलीफोन, पोस्ट ऑफिस आदि सरकारी संस्थाओं पर अधिकार कर लिया। मंत्रिमंडल के सदस्यों को बंदी बना लिया और देश की राजधानी पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया केरेनरकी  देश छोड़कर भाग गया।  बोल्शेविक ने लेनिन  के नेतृत्व में अपनी सरकार स्थापित कर दी, जिसमें ट्रात्स्की  विदेश मंत्री और स्टीलन  अधीन राष्ट्र का सचिव बना।


लेनिन ने  8 मार्च 1917 ईस्वी को  चार महत्वपूर्ण घोषणाएं की-

1  रूस की सरकार सिख युद्ध बंद करके जर्मनी के साथ न्याय पूर्ण संधि कर लेगी।

2 रूस की समस्त कृषि योग्य भूमि किसानों ने बिना किसी मुआवजे की बढ़ती जाएगी और किसानों को भरपेट रोटी कपड़ा आदि देने की व्यवस्था की जाएगी।

3  जारसाही नौकरशाही का अंत करके प्रशासनिक पदों पर  बोलशेविक दल के सदस्यों को नियुक्त किया जाएगा।

4  रूस की शासन 77 सर्वहारा वर्ग का प्रभुत्व स्थापित किया जाएगा।


बोल्शेविक क्रांति की सफलता के कारण

अल्पमत होते हुए भी  बोल्शेविक रूस की शासन  सत्ता पर अधिकार करने में सफल रहे।

1   बोल्शेविक को रूस की साधारण जनता का पूर्ण सहयोग और समर्थन प्राप्त हुआ।

2 बोल्शेविक ने  बड़े ही उचित और अनुकूल संगम में क्रांति कर के शासन सत्ता पर अधिकार करने में सफलता की।

3 बोल्शेविक के  विरोधियों को जनता का समर्थन ना मिल सका ।

4  विरोधियों की फूट और दोष पूर्ण नीति भी विरोधियों भी बोल्शेविक की सफलता का कारण बनी ।


रूसी क्रांति का महत्व

सनम इसवी की रूसी क्रांति बीसवीं शताब्दी के  इतिहास की सर्वाधिक महत्वपूर्ण कांति है। इस क्रांति ने सर्वप्रथम विश्व में  विश्व में  कार्ल मार्क्स के विचारों को  व्यवहारिक रूप में स्थापित करके दिखाया। और  तानाशाही का बोलबाला हो गया।